6 की उम्र में नेत्र परीक्षण बताएगा, मायोपिया होगा कि नहीं


पहली कक्षा में पढ़ने वालों के बच्चों के नेत्र परीक्षण से समझा जा सकता है कि जब वे टीनेजर होंगे तब क्या उनमें निकट दृष्टि दोष या मायोपिया के लक्षण होंगे। यह एक आसान टेस्ट है जिसमें विभिन्न लैंसों के प्रयोग से मरीज़ को दूर से एक आई चार्ट पढ़ना होता है जिससे दृष्टि दोष को मापा जा सकता है। इसके बाद मरीज़ को यह बताना होता है किस लैंस से उसे बेहतर दिखायी दिया। पहली कक्षा में पढ़ रहे बच्चे के इस परीक्षण से तय किया जा सकता है कि जब वह आठवीं कक्षा में होगा तब उसे किस तरह के चश्मे की ज़रूरत होगी। यानी पहले से पता चलने पर अभिभावकों के लिए यह संभव होगा कि भविष्य में पड़ने वाली चश्मे की ज़रूरत से अपने बच्चे का बचाव कर सकें।

यह तथ्य एक अध्ययन में सामने आया है जिसमें 6 से 11 साल की उम्र के 4500 बच्चों का अध्ययन किया गया जो रिसर्च की शुरुआत में किसी दृष्टि दोष के शिकार नहीं थे। 20 साल तक किये गये इस अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने इन सभी बच्चों के नेत्रों को प्रभावित करने वाले कारणों पर बराबर नज़र रखी और बार-बार मायोपिया संबंधी परीक्षण किये। इस तरह पाया गया कि 7 से 13 वर्ष की आयु के बीच 414 बच्चे निकट दृष्टि दोष के शिकार हुए। मेडिकल न्यूज़ टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक यह अध्ययन जेएएमए ऑप्थेमोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

कोलंबस स्थित ओहिओ स्टेट यूनिवर्सिटि के ऑप्टोमेट्री कॉलेज की डीन प्रो. कार्ला ज़ैडनिक की अगुआई में हुए इस अध्ययन के अनुसार 13 प्रकार के फैक्टरों पर नज़र रखी गयी लेकिन अपवर्तन संबंधी एरर से ही मायोपिया के लक्षणों का अनुमान बखूबी हुआ। इस सीधे परीक्षण में शोधकर्ताओं ने पाया कि शुरुआत में जिन बच्चों की नज़र सामान्य थी, 6 से 7 वर्ष की उम्र में उनमें दूरदृष्टि दोष के मामूली लक्षण दिखे। जिन बच्चों में मामूली दूरदृष्टि दोष था या बिल्कुल नहीं था, भविष्य में उनके मायोपिया से पीड़ित होने की पूरी आशंका थी।

इस अध्ययन में एक और खतरनाक फैक्टर पर नज़र रखी गयी लेकिन मायोपिया का उससे कोई संबंध नहीं पाया गया। यह फैक्टर था पास का काम जैसे पढ़ाई या टीवी या कंप्यूटर स्क्रीन पास से देखना।

यह भी तथ्य सामने आया कि जो बच्चे आउटडोर ज़्यादा समय बिताते हैं, उनमें मायोपिया की आशंका कम रहती है। हालांकि प्रो. ज़ैडनिक के अनुसार परिस्थितियों के अनुसार इसको पूर्णतः सही निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। फिर भी, हाल में हुए अन्य शोधों में भी यह बात सामने आयी है कि सूर्य की रोशनी में समय बिताना मायोपिया से बचाव का सही तरीका है।

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