एमएसजी (MSG) के बारे में गलत धारणा कब बनी? 1968 में


एमएसजी (MSG) के बारे में गलत धारणा कब बनी? 1968 में

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लगभग 50 सालों से लोग मानते आ रहे हैं कि मोनोसोडियम ग्लूटामेट एमएसजी युक्त भोजन किसी प्रकार से हानिकारक होता है और इसका सेवन नहीं करना चाहिए। चूंकि कई फूड पैकेजिंग उत्पादों पर अक्सर विज्ञापन होता है “नो एमएसजी” या “नो एडेड एमएसजी” इसलिए उपभोक्ता बिना यह जाने कि यह नुकसानदायक कयों है, इसके बारे में धारणा बना चुके हैं। कुछ लोगों ने एडेड एमएसजी के सेवन के बाद एलर्जी होने की शिकायत की जिसके लक्षण सिरदर्द, वमन, पसीना या सुन्नता बताये गये। हालांकि दशकों से किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन में इस बात के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं कि एडेड एमएसजी से एलर्जी की शिकायत होती है या यह लंबे समय के लिए लोगों के लिए हानिकारक है। क्या एमएसजी के प्रति भय का कारण कोई मिथक है?

एमएसजी के बारे में गलत धारणा कैसे बनी?

एमएसजी के स्वास्थ्य पर असर के विषय में विवाद 1968 में शुरू हुआ जब न्यू इंग्लैंड ऑफ मेडिसिन जर्नल में एक पत्र में विवरण प्रस्तुत किया गया जिसे “चाइनीज़ रेस्टरॉं सिंड्रोम” कहा गया। इसमें चाइनीज़ भोजन के सेवन के बाद लोगों द्वारा महसूस किये गये खराब प्रभावों का हवाला यिा गया। लेखक ने सवाल उठाया कि चाइनीज़ भोजन में सामान्यतया पाये जाने वाले एमएसजी के सेवन का संबंध तो इन प्रतिक्रियाओं से नहीं था।

भोजन में एमएसजी इसलिए मिलाया जाता है ताकि उसमें उमामी, खट्टे-नमकीन स्वाद के लिए इस्तेमाल होने वाला जापानी शब्द, बढ़ सके। एक जापानी भोजन शोधकर्ता ने 1908 में एमएसजी युक्त सी केल्प में से ग्लूटामेट यानी एमएसजी में से जी निकालकर यह पाया कि यह वह तत्व है जो उमामी के लिए ज़िम्मेदार है। इससे यह खुलासा हुआ कि क्यों पूर्व एशियाई भोजन में एमएसजी इतना अधिक होता है।

समय के साथ, “चाइनीज़ रेस्टरॉं सिंड्रोम” शब्द का इस्तेमाल प्रचलित हो गया और लोगों ने दावा किया कि पूर्व एशियाई भोजन के सेवन के बाद उन्होंने समान लक्षणों का अनुभव किया। लेकिन, चाइनीज़ भोजन में एमएसजी से जुड़ी एलर्जी की बात केवल अफवाह ही थी।

एमएसजी के खिलाफ प्रमाण क्या है?

कुछ ठोस नहीं है। न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान के बारे में ब्लॉगिंग करने वाले साइमन ऑग्ज़ेन्हेम ने बिग थिंक पर लिखा कि एमएसजी के प्रति लोगों के एलर्जिक प्रतिसादों के बारे में आये सभी अध्ययन “छोटे, अनियंत्रित और पक्षपातपूर्ण थे जिनमें प्रतिभागियों की अपेक्षाओं का असर नतीजों पर पड़ा।” दूसरे अध्ययनों में, जिनमें प्रतिभागियों को पता नहीं था कि अध्ययन का उद्देश्य क्या है और उन्हें अचानक या तो एमएसजी या प्लेसबो का सेवन कराया गया, इसमें पता चला कि जिन प्रतिभागियों को एमएसजी का सेवन कराया गया और जिन्हें नहीं, दोनों के लक्षणों में काई अंतर नहीं था।

कई अध्ययनों की समीक्षा करने वाला एक शोध पत्र 2009 में सामने आया जिसमें पाया गया कि “इन स्थितियों अस्थमा, रैशेज़, नाक में होने वाली जलन – के विकास और एमएसजी के सेवन के बीच कोई स्पष्ट या सीध संबंध दर्शाने वाला कोई शोध दशकों में नहीं हुआ।” दूसरी ओर, यह भी सही है कि 1990 के दशक में यूएस के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा आहूत एक रिपोर्ट में पाया गया कि जब लोग किसी और भोजन के बिना, 3 ग्राम एमएसजी का सेवन करते हैं तो उनमें से कुछ ने नकारात्मक लक्षण दिखने की बात कही। यह भी उल्लेखनीय है कि एक सामान्य सर्विंग में एडेड एमएसजी की मात्रा 0.5 ग्राम होती है, तो 3 ग्राम के लिए 6 सर्विंग लेना होंगी जो सामान्य नहीं है।

क्या एमएसजी अप्राकृतिक रसायन है?

एमएसजी के बारे में कई लोग नहीं जानते कि यह कुछ चीज़ों में प्राकृतिक रूप से मिल सकता है जैसे टमाटर, ब्रोकॅली, मशरूम्स, मटर और अखरोट। एमएसजी के इस प्रकार को सिर्फ ग्लूटामेट निरूपित किया जाता है। व्युत्पन्न भोजन जैसे पार्मेसन चीज़, सोया सॉस आदि में ग्लूटामेट बहुत अधिक होता है। मानव शरीर में प्रोटीन से भी यह उत्पन्न होता है और यूएसएफडीए का कहना है कि “एमएसजी में शामिल ग्लूटामेट को फूड प्रोटीन में शामिल ग्लूटामेट से रासायनिक तौर पर परस्पर भिनन नहीं माना जा सकता।”

एमएसजी के लिए नियामक क्या हैं?

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने तीन श्रेणी के उत्पादों में एमएसजी के इस्तेमाल को मंज़ूरी दी है: “भोजन संबंधी पेस्ट/अन्य सॉस, सूप और पाउडर” जो फ्लेवर के लिए इस्तेमाल होते हैं। 51 भोजनों की सूची है जिसमें एमएसजी नहीं मिलाया जा सकता जिसमें 12 साल से कम बच्चों के लिए बनने वाले भोजन पदार्थ शामिल हैं। पास्ता और नूडल्स की सीज़निंग के लिए एमएसजी का इस्तेमाल हो सकता है। एमएसजी कितना मिलाया जाये इस बारे में कोई सीमा निर्धारण नहीं है, बस उल्लेख है कि “उत्पादन की सही परंपरा” का निर्वाह हो।

क्या एमएसजी के लाभ भी हैं?

सारे विवाद के बावजूद, हां। कुछ लोगों के स्वास्थ्य के लिए यह वाकई लाभकारी है। एक तो, जिन भोजनों में प्राकृतिक रूप से एमएसजी शामिल है जैसे ब्रोकॅली, उनसे अन्य कई ज़रूरी पोषक तत्व भी मिलते हैं। और, चूंकि ग्लूटामेट के कारण फ्लेवर पैदा होता है इसलिए यह उनके लिए लाभकरी है जिन्हें उम्र या बीमारी के कारण भूख कम लगने की शिकायत हो। इससे कुछ खाद्य पदार्थों का स्वाद शोर भरे एयरप्लेन में बेहतर होता है।

तो आपको एमएसजी युक्त भोजन खाना चाहिए?

यह आपका प्यक्तिगत निर्णय है कि आप ऑर्गेनिक लिंक या जेनेटिकली मोडिफाइड भोजन करना चाहते हैं। शोध के अनुसार एमएसजी हानिकारक नहीं है। बेशुमार शोधों के बावजूद कुछ लोग यह नहीं मानते कि एमएसजी हानिकारक या विषैला नहीं है। विज्ञान की बात सुनने के बाद भी कुछ लोग कहते हैं कि इसके सेवन से उन्हें सिरदर्द, गले में जलन या अन्य लक्षण दिखते हैं। खैर, इन लोगों के लिए खुशखबर है कि ताज़ा लेबलिंग नियमों में यह अनिवार्य कर दिया गया है कि खाद्य पदार्थ में एमएसजी होने पर उसका उल्लेख किया जाएगा और अगर उस पदार्थ में शामिल किसी तत्व में प्राकृतिक रूप से एमएसजी मौजूद है तो पैकिंग पर “नो एमएसजी” या “नो एडेड एमएसजी” नहीं लिखा जाएगा।

तो वापस चलते हैं उसी बात पर कि “नो एमएसजी” लेबलिंग होती ही क्यों है। जबकि एमएसजी के नुकसानदायक होने के संबंध में कोई ठोस प्रमाण है ही नहीं, ऐसी स्थिति में अथॉरिटि द्वारा इस तरह की शर्त लगाना कहां तक जायज़ है और क्यों खाद्य पदार्थ निर्माता एमएसजी न होने को विज्ञापन के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करना बंद नहीं कर देते।

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