गे, लेस्बियन बच्चे जल्दी होते हैं बुलइंग के शिकार


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जैसे-जैसे बच्चे बड़ी कक्षाओं में जाते हैं वैसे-वैसे बुलइंग के औसत मामले घटते हैं लेकिन गे और लेस्बियन छात्र बुलइंग के शिकार होते रहते हैं। एक नये अध्ययन में पाया गया है कि लेस्बियन, गे और उभयलिंगी (एलजीबी) बच्चों को कक्षा पांच से ही निशाना बनाया जाता है, जबकि उनकी लैंगिक पहचान पूरी तरह स्थापित भी नहीं हो पाती।

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित शोधपत्र के प्रमुख लेखक, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर और बॉस्टन चिल्ड्रन्स अस्पताल के जनरल पेडियाट्रिक्स विभाग के प्रमुख मार्क मार्क श्यूस्टर का कहना है कि ‘‘दूसरे स्रोतों के अनुसार, सामान्य रूप सेबुलइंग की घटनाएं कम होती हैं जब बच्चे स्कूल की बड़ी कक्षाओं में पहुंचते हैं लेकिन असमानता नहीं घटती। बुलइंग और शोषण के मामले में हमने यह पैटर्न सभी कक्षाओं में देखा।’’ पहले हुए शोधों में पाया गया था कि एलजीबी बच्चे अपने दूसरे साथियों की तुला में बुलइंग के शिकार ज़्यादा बनते हैं। हालांकि ऐसे अध्ययनों के लिए बड़ी उम्र के टीनेजरों और वयस्कों से उनके अतीत के बारे में अनुभव जाने गये थे। लोगों की याददाश्त पर आधारित ऐसे अध्ययनों से प्राप्त नतीजे पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माने जा सकते।

इस नये अध्ययन में स्कूली प्रगति कर रहे बच्चों के अनुभवों को अंकित किया गया है। यूएस के छात्रों को कक्षा 5 के समय उनके अनुभवों के बारे में इंटरव्यू किया गया और फिर उन्हें कक्षा 7 से 10 के दौरान भी इंटरव्यू किया गया। बच्चों से पूछा गया कि क्या वे बुलइंग के शिकार हुए हैं और अगर उन्होंने बताया कि हां, हफ्ते में कम से कम एक बार तो उन्हें बुलइंग के शिकार की श्रेणी में रखा गया। उनसे यह भी पूछा गया कि क्या उन्हें बहिष्कार की स्थिति झेलनी पड़ी है जैसे सामाजिक बहिष्कार या धमकियां या शारीरिक हमला। जिन्होंने ऐसा होना स्वीकार किया उन्हें साथियों द्वारा उत्पीड़ित की श्रेणी में रखा गया। कक्षा 10 में उनसे पूछा गया कि उनका लैंगिक ओरिएंटेशन और आकर्षण क्या है, जिन्होंने समान लैंगिकता के प्रति आकर्षण जताया, उन्हें एलजीबी श्रेणी में रखा गया जो अल्पसंख्यक लैंगिकता की श्रेणी भी है।

अध्ययन में पाया गया कि जैसे जैसे छात्र बड़े होते हैं बुलइंग कम होती जाती है, जो कि अच्छी खबर है। जिन बच्चों ने समान लैंगिकता के प्रति आकर्षण होना स्वीकार किया उनके साथ अपने दूसरे साथियों की तुलना में बुलइंग के शिकार होने की आशंका 1.9 गुना ज़्यादा पाई गई जबकि पीड़ित होने की आशंका उनमें डेढ़ गुना ज्त्रयादा थी।

बुलइंग की फ्रिक्वेंसी

 कक्षा 5कक्षा 7कक्षा 10
हेट्रोसेक्सुअल8.4%3.6%1.3%
एलजीबी13.2%7.9%3.9%
शोषण के शिकार होने की फ्रिक्वेंसी

 कक्षा 5कक्षा 7कक्षा 10
हेट्रोसेक्सुअल21.2%8.7%5.7%
एलजीबी26.4%14.4%10.3%

उल्लेखनीय है कि जिन बच्चों ने कक्षा 10 में समान लैंगिकता के प्रति आकर्षण स्वीकार किया वे कक्षा 5 की तुलना में बुलइंग और उत्पीड़न के ज़्यादा शिकार पाये गये। शोधकर्ताओं ने लिखा है कि शुरुआती उम्र में ज़्यादातर बच्चे अपने सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में व्यक्त नहीं कर पाते। हालांकि आलेख में इससे आगे कोई प्रश्न आधारित चर्चा नहीं है।

नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटि के एलजीबीटी हेल्थ एंड डेवलपमेंट में शोधकर्ता मिचेल बर्केट ने रायटर्स को बताया कि कुछ बच्चे कक्षा 5 के समय में ही अपने सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में जागरूक होते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि जानबूझकर या अनजाने में सेक्सुअल मायनॉरिटि के बच्चे उत्पीड़न के शिकार होने के कुछ संकेत देते हैं इसलिए अभिभावकों को ऐसे बच्चों के संकेतों के प्रति सतर्क व सजग रहना चाहिए न कि उनका मज़ाक बनाना चाहिए। उन्हें ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए कि उनके बच्चे खुद को नकारा हुआ समझें या यह समझें कि उनका उत्पीड़न जायज़ ही है।

इस अध्ययन के नतीजों में एक और तथ्य उभरकर आया है जो जिज्ञासा उत्पन्न करता है। वह यह कि बच्चों ने कई नकारात्मक स्थितियों का सामना होना स्वीकारा है लेकिन उन्होंने इसे बुलइंग नहीं माना है। मूल आलेख में इस बात को लेकर कोई विचार नहीं किया गया है। न्यूज़पाई ने अध्ययन के लेखकों से संपर्क किया है और उनसे प्रतिक्रिया मिलने पर इस बारे में अपडेट किया जाएगा।

आखिरकार, बर्केट और ष्यूस्टर दोनों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि बुलइंग गंभीर मुद्दा है और इसके शिकार बच्चों को गंभीरता से लेना चाहिए और उन्हें पूरा सहयोग देना चाहिए। अभिभावकों को संकेतों को समझना चाहिए जैसे शारीरिक संकेत यानी बच्चे के शरीर पर खरोंचें या असामान्य निशान बिना किसी कारण के नहीं होते। उन्हें बच्चों के व्यवहार पर भी नज़र रखना चाहिए जैसे चिंता, हताशा और स्कूल या स्कूल बस में जाने में किसी किस्म का संकोच उनके बारे में कोई संकेत दे सकता है।

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