मेटाबॉलिज़्म के लिए खतरनाक है छुट्टियों की हाई फैट डाइट


Photo: Odua | Dreamstime.com

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सभी जानते हैं कि लंबे समय तक हाई फैट भोजन का सेवन कना सेहत के लिए खतरा हो सकता है, और इससे मोटापे के खतरे के साथ ही डायबिटीज़, दिल की बीमारियों औश्र कैंसर की आशंका बढ़ती है। रोज़मर्रा में संतुलित डाइट के बावजूद अगर आप कुछ ही दिन अनियंत्रित हाई फैट भोजन करते हैं तो यह आपके पाचन तंत्र का सत्यानाश कर सकता है।

आप खुद को तसल्ली देते हैं कि छुट्टियां हैं, कुछ ही दिनों की बात है और आप फिर नियमित डाइट अपना लेगे सलिए कोई बात नहीं। लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया है कि सिर्फ पांच दिनों के लिए अगर आप वसायुक्त भोजन करते हैं तो यह आपकी मांसपूशियों द्वारा ग्लूकोज़ के पान के तरीके को लंबे समय तक के लिए प्रभावित कर सकता है।

मेटाबॉलिज़्म एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कोशिकाएं खाये गये भोजन को उष्मा में परिवर्तित करती हैं। फिर इस उर्जा का इस्तेमाल शरीर विविध क्रियाओं में करता है, यहां तक कि आराम करने के लिए भी शरीर को उर्जा की ज़रूरत होती है। एक व्यक्ति दिन भर में जितनी कैलोरीज़ जलाता है, उसका 70 फीसदी इस्तेामल तो मूलभूत क्रियाओं में ही होता है जैसे सांस लेना, धड़कन और सोचना आदि। मेटाबॉलिज़्म में तीन किस्म के द्रव को तोड़ा जाता है: कार्बोहाइड्रेट, फैट यानी वसा और प्रोटीन। कार्बोहाइड्रेट का एक रूप ग्लूकोज़ है जिसे आप शकर का सरलतम रूप समझ सकते हैं और यह मेटाबॉलाइज़ करने में आसान होता है। मेटाबॉलिज़्म की प्रक्रिया ग्लूकोज़ टूटकर कार्बोन डाई ऑक्साइड और पानी बनाता है। भोजन और पेय के आलावा शरीर में लिवर ग्लूकोज़ का उत्पादन करता है। जो ग्लूकोज़ लिवर द्वारा उत्पादित होता है वह रक्त में शर्करा का संचार करता है और मांसपेशियों द्वारा अवशोष्ज्ञित या मेटाबॉलाइज़ किया जाने वाला ग्लूकोज़ इंसुलिन नामक हॉर्मोन द्वारा नियंत्रित होता है। अगर शरीर पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता तो टाइप 1 डायबिटीज़ हो सकती है और अगर शरीर इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया नहीं करती तो टाइप 2 डायबिटीज़।

फूड नेविगेटर की रिपोर्ट के मुताबिक वर्जिनिया टेक कॉलेज ऑफ एग्रिकल्चर एंड लाइफ साइंसेज़ से जुड़े अध्ययनकर्ता मैट हल्वर और उनकी टीम ने प्रयोग के दौरान कौलूज की उम्र के 12 स्वस्थ व्यक्तियों की हाई फैट डाइट के प्रभावों का अवलोकन किया। इन सभी को वसायुक्त भोजन दिया गया जैसे सौसेज़ बिस्किट, मैकेरानी, चीज़ और मक्खन आदि। इस डाइट में उन्हें सामान्यतया 30 फीसदी फैट के स्थान पर 55 फीसदी फैट दिया गया। हालांकि कुल क्ेलोरीज़ की संख्या उतनी ही रखी गई जितनी वे पहले लेते थे। एक समूह को पहले ही एक्स्ट्रा हाई फैट भोजन – 880 किलोकैलोरीज़ जिसमें से 63 फीसदी फैट, 25 फीसदी कार्बोहाइड्रेट और 12 फीसदी प्रोटीन – दिया गया और दूसरे समूह को 5 दिन के हाई फैट डाइट अवधि के तुरंत बाद।

पहले समूह में हाई फैट डाइ का कोई असर मांसपेशी कृत मेटाबॉलिज़्म पर नहीं देखा गया न ही इंसुनि के संवेदन पर। दूसरे समूह में टीम ने देखा कि ग्लूकोज़ को ऑक्सीडाइज़ करने की मांसपेशियों की क्षमता पर हाई फैट भोजन ने बुरा असर डाला। हल्वर का कहना है कि “कई लोग मानते हैं कि वे कुछ समय के लिए हाई फैट भोजन करेंगे तो कुछ नहीं होगा। लेकिन यह पता चला कि पांच दिन का समय लगता है जब आपके शरीर की मांसपेशियां विरोा करना शुरू कर देती हैं।”

अध्ययन के लेखकों ने कहा कि हालांकि 5 दिन की हाई फैट डाइट के बाद प्रयोग में शामिल व्यक्तियों का न तो वज़न बढ़ा और न ही इंसुलिन प्रतिरोध के कोई लक्षण दिखे। उन्होंने कहा कि दूसरे समूह में देखे गये मेटाबॉलिज़्म संबंधी बुरे प्रभावों के कारण उनमें इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया न होने जैसी समस्या की संभावना देखी गई जिसकी वजह से डायबिटीज़ और अन्य रोग संभव हैं।

इस अध्ययन की सीमा यह है कि एक तो यह कम लोगों पर किये गये प्रयोगों पर आधारित है और दूसरे जिन पर प्रयोग हुआ, उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं की। अब शोधकर्ता वह अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं जिसमें पता चल सके कि कैसे कम समय के मेटाबॉलिक परिवर्तनों के कारण किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर दूरगामी असर पड़ता है और क्या उसके हेल्दी डाइट की ओर लौटने के बाद नुकसान कम हो सकता है?

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