बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पीछे हटें


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अपने बच्चे के स्कूल जीवन या उसके दोस्ती के दायरे में ज़्यादा दखल देने से आपका बच्चा समस्याओं व निराशों से अपने आप लड़ने के सबक नहीं सीख पाता है। आजकल अभिभावक बच्चे को ज़रा सी मुश्किल होने पर ही उसके समाधान के लिए बेतहाशा खड़े हो जाते हैं जबकि बच्चों को एक हद तक खुद ही इन समस्याओं से जूझने दिया जाये तो वे अपने भविष्य और जीवन के लिए महत्वपूण्र सबक सीख सकते हैं।

पनामा सिटी, फ्लोरिडा में किलनिकल मेंटल हेल्थ काउंसलर और एक स्कूल काउंसलर थॉमस विंटरमैन ने याहू पेरेंटिंग को बताया कि “मैं जिस स्कूल में काम करता हूं, वहां अभिभावक बच्चे को थोड़ा भी मुश्किल में देखकर सामने आ जाते हैं, स्कूल के अधिकारियों से संपर्क करते हैं और खराब अंक लाने पर स्कूल की शिक्षकों की आलोचना करते हैं।” उन्होंने कहा कि “यह सही है कि सभी अभिभावक अपने बच्चों को सुरक्षा देना चाहते हैं। लेकिन इस तरह की दखलंदाज़ी के कारण बच्चे अपनी समस्याओं का समाधान खुद नहीं खोज पाते और एक आत्मनिर्भर वयस्क बनने में मुश्किल महसूस कर सकते हैं।”

जो अभिभावक अपने बच्चों को लेकर अधिक सुरक्षात्मक या दखलंदाज़ी वाला रवैया अपनाते हैं, उन्हें हेलिकॉटर पेरेंट्स कहा जाता है। अभिभावक ऐसा बर्ताव क्यों करते हैं, इसके कुछ कारण यहां दिये जा रहे हैं:

  • भविष्य की चिंता: अभिभावक अक्सर यह सुनते रहते हैं कि यह प्रतिस्पर्धा की दुनिया है, इसलिए वे अपने बच्चों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने को लेकर अधिक से अधिक हस्तक्षेप करते हैं।
  • हानि की आशंका: बच्चे को शारीरिक या मानसिक रूप से नुकसान होने की आशंका एक कारण है कि अभिभावक ज़रूरत से ज़्यादा सुरक्षात्मक रवैया अपनाते हैं।
  • अपनी परवरिश की प्रतिक्रिया: जो अभभावक यह मानते हैं कि बचपन में उन पर ध्यान नहीं दिया गया या वे प्रेम से वंचित रहे, वे अपने बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा दुलारते हैं।
  • अन्य अभिभावकों का असर: दूसरे अभिभावकों को उनके बच्चों के प्रति अधिक ध्यान दिये जाने के कारण कुछ अभिभावक खुद को दोषी समझने लगते हैं और प्रभावित होकर वैसा ही बर्ताव करने लगते हैं।

अभिभावकों का बच्चों के प्रति अधिक सुरक्षात्मक रवैया क्यों है, यह समझा जा सकता है लेकिन ज़रूरत यह समझने की है कि क्या इससे बच्चों को वाकई मदद मिलती है। जो अभिभावक बच्चों को बात-बात पर सहयोग या सलाह देते हैं, सही फैसले लेने के बारे में सतर्कता का निर्देश देते हैं और समस्याएं सुलझा देते हैं, वे शायद अपने बच्चों को अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए तैयार नहीं करते।

बाल विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को इसकी ज़रूरत नहीं है कि उनकी हर समस्या सुलझा दी जाये। बल्कि अभिभावकों को यह सिखाना चाहिए कि जीवन के अच्छे और मुश्किल क्षणों से कैसे गुज़रा जाता है। आप यह जताएं कि आप सहयोग के लिए तैयार हैं लेकिन समस्या का हल उन्हें ही खोजना है तो बच्चा शायद जीवन को बेहतर बना सकता है और भावनात्मक रूप से दृढ़ हो सकता है।

न्यूयॉर्क में क्लिनिकल मनोविज्ञानी जैनेट सॉयर कोहेन का कहना है कि ‘‘अभिीाावक बच्चों के शिक्षक होते हैं। अगर आप दिन भर उसे बचाते रहेंगे तो बच्चा अपनी मुश्किल से जूझना और उबरना कैसे सीखेगा।’’

इसका मतलब यह नहीं है कि अगर आपका बच्चा मुश्किल में है तो आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। उनसे उस स्थिति के बारे में बात करें और और उसे सुलझाने के विचार के बारे में भी। उनके तरीके को सुनें और अपने विचार भी बताएं। उन्हें मुश्किल से जूझने के लिए कहें और यह भी कहें कि ज़रूरत पड़ने पर आप उनके साथ हैं।

विंटरमैन कहते हैं कि “इस तरह से, स्थिति काबू के बाहर होने पर आप बच्चों के सुरक्षा कवच बनें।” अगर मुश्किल बढ़ जाये या आपका बच्चा शोषित, पीड़ित महसूस करे तो समय है कि अभिभावक दखल दें।

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