बच्चों के टीकाकरण पर भारत हुआ सजग


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दुनिया भर में हर साल करीब 15 लाख बच्चों की मौत गलत ढंग से होने वाले टीकाकरण से हो जाती है जबकि उन रोगों से प्रतिरक्षण के ज़रिये बचाव संभव है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में दुनिया में बच्चों की आबादी के लगभग आधे 2.2 करोड़ बच्चे डिपथीरिया, खांसी और टिटनस डीटीपी3 के बचाव के लिए होने वाले नियमित टीकाकरण से महरूम रहे। इनमें से आधे बच्चे सिर्फ तीन देशों के थे, भारत, पाकिस्तान और नाइजीरिया।

अब तक, 129 देशों में प्रतिरक्षण स्तर 90 फीसदी से अधिक है। इसके कारण हर साल तीन लाख जानें बचाई जाती हैं। पिछले दशकों में प्रतिरक्षण को लेकर नाटकीय प्रगति देखी गई थी लेकिन अब संकेत मिले हैं कि यह बढ़ोत्तरी थम चुकी है। इसके साथ ही, टीके के प्रकार को लेकर दुनिया भर में प्रतिरक्षण कवरेज विभिन्न है। डीटीपी3, पोलियो और चेचक के लिए दुनिया भर में 84 फीसदी प्रतिरक्षण है जबकि रोटावायरस के लिए सिर्फ 14 फीसदी, यह डायरिया के कारण होने वाली मौतों का मुख्य कारण है।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में, मूलभूत प्रतिरक्षी टीकाकरण का लाभ 1 से 2 साल के सिर्फ 44 फीसदी बच्चों का मिलता है और ग्रामीण क्षेत्रों में और भी कम। देश में पिछले कुछ समय में टीकाकरण अभियान उल्लेखनीय रूप से सफल रहे हैं और विशेषकर पोलियो उन्मूलन में आशातीत सफलता मिली है।

अप्रेल 2015 में भारत सरकार ने 2020 तक 90 फीसदी टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करने के लिए नये टीकाकरण अभियान की शुरुआत की है। कई चरणों के इस कार्यक्रम को पहले उच्च प्राथमिकता वाले 201 ज़िलों में लागू किया जाएगा और फिर अन्य 297 ज़िलों में। भारत में कुल 640 ज़िले हैं। प्रथम चरण में अभियान का लक्ष्य है 2 साल तक के सभी बच्चों और गर्भवती महिलाओं को संपूर्ण प्रतिरक्षी टीकाकरण देना।

इस कार्यक्रम में 7 रोगों पर फोकस किया जाएगा: डिप्थीरिया, खांसी, टिटनस, पोलियो, टीबी, चेचक और हेपेटाइटिस बी। कुछ ज़िलों में इसमें दो और रोगों को केंद्र में रखा जाएगा: जापानी एनसेफलाइटिस और हीमोफिलस इन्फ्लुएंज़ा टाइप बी। भारत में बच्चों की मौतों का एक प्रमुख कारण डायरिया संबंधी रोटावायरस को कार्यक्रम में शामिल न किया जाना चिंता का विषय है।

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