दक्षिण भारत में बढ़ रही है डायबिटीज़


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भारत में डायबिटीज़ ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ रही है। यह रोग अधिक फैट वाले भोजन और आलसी लाइफस्टाइल से जुड़ा हुआ है। अब तक ऐसा सोचा जाता है कि यह रोग सिर्फ अमीरों को प्रभावित करता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से नतीजे मिले हैं कि शहरी गरीब भी इस रोग के शिकार हैं। और तो और यह भारत के दक्षिण में ज़्यादा पाया जा रहा है, जहां माना जाता है कि बेहतर सेहत प्रोफाइल है।

फूड नेविगेटर-एशिया के अनुसार भारत सरकार के राष्ट्रीय कार्यक्रम एनपीसीडीसीएस ने पाया है कि चेन्नई की शहरी झुग्गी बस्ती में हर चार में से एक को डायबिटीज़ है। जबकि राष्ट्रीय औसत इसके एक तिहाई से भी कम 7 फीसदी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका कारण भोजन की आदतों मं आया बदलाव है। लोग पैकेज्ड फूड ज़्यादा खा रहे हैं जिसमें ज़्यादा कैलोरीज़, शक्कर और एनिमल फैट होता है। साथ ही इसमें सब्ज़ियों व फलों की अपेक्षा बहुत कम विटामिन व खनिज होते हैं।

पारंपरिक भारतीय भोजन की अधिकता भी डायबिटीज़ का कारण हो सकती है। सीताराम इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च के वरिष्ठ बाल चिकित्सक एच पी एस सचदेव ने टाइम्स ऑफ इंडिा को बताया कि “यह मान्यता गलत है कि सिर्फ बर्गर और पीज़ा जैसे भोजन से ही डायबिटीज़ की आशंका बढ़ती है। अधिक तले हुए भोजन जैसे समोसा, कचौड़ी और गुलाबजामुन भी इसका कारण होते हैं।”

भारत के दक्षिण में बढ़ रही डायबिटीज़ का कारण यह भी माना जा सकता है कि वहां भोजन पकाने के लिए नारियल तेल का अधिक इस्तेमाल होता है और चावल बहुत खाया जाता है। नारियल तेल के संतप्त वसा और चावल के कार्बोहाइड्रेट वाली इस भोजन शैली के साथ ज़रूरी है कि संतुलित मात्रा का ध्यान रखने के साथ ही शारीरिक गतिविधियों और व्यायाम पर ध्यान दिया जाये। शोध के अनुसार सफेद चावल के सेवन से टाइप 2 डायबिटीज़ होने की आशंका बढ़ती है। लेख के अनुसार हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक अध्ययन में पाया गया है कि जो लोग दिन में तीन या चार सर्विंग्स में चावल का सेवन करते हैं उनमें उन लोगों की तुलना में डायबिटीज़ की आशंका डेढ़ गुना होती है जो कम चावल खाते हैं।

लोगों के इस तरह के भोजन के माध्यम से समझा जा सकता है कि क्यों डायबिटीज़ बढ़ रही है और क्यों यह उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण में ज़्यादा है। इसके साथ ही देश की भोजन संबंधी आदतों को लेकर अप टू डेट सर्वे कराये जाने की ज़रूरत बनी हुई है क्योंकि आखिरी बार ज़िला स्तर पर कराया गया पोषण सर्वे 2013 में जारी हुआ था।

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