5 में से 1 प्राथमिक शिक्षक क्वालिफाइड नहीं


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देश भर में की गई एक रिसर्च में पता चला है कि प्रारंभिक शिक्षा क्षेत्र में हर पांच में से एक शिक्षक के पास पढ़ाने के लिए प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन नहीं है। और अगर अनुबंध पर रखे गये शिक्षकों की बात की जाये ता 2013-14 में कुल शिक्षकों के 6.5 फीसदी ऐसे शिक्षकों में से आधे से कुछ ज़्यादा ही प्रोफेशनली क्वालिफाइड हैं। छोटे राज्यों और उत्तर-पूर्व में सबसे कम क्वालिफाइड शिक्षक हैं।

शिक्षकों की प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन संबंधी यह शोध भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के डेटा पर आधारित है। इस सर्वे में दिल्ली और गुजरात में 100 फीसदी शिक्षकों के पास पर्याप्त क्वालिफिकेशन होना पाया गया है जबकि मेघालय, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश सबसे नीचे क्रम पर हैं जहां 31.29 फीसदी शिक्षक ही क्वालिफाइड हैं।

इसके अलावा कई राज्यों में अनुबंध के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति होती है, जिनमें से कई के पास पर्याप्त क्वालिफिकेशन नहीं है। उदाहरण के तौर पर, मेघालय में प्रारंभिक शिक्षा क्षेत्र में 10 फीसदी शिक्षक अनुबंधित हैं, जिनमें से सिर्फ 11 फीसदी प्रोफेशनली क्वालिफाइड हैं। मिज़ोरम में 19.2 फीसदी शिक्षक अनुबंधित हैं जिनमें से 21.1 फीसदी के पास ही ठीक क्वालिफिकेशन है। पश्चिम बंगाल में अनुबंधित शिक्षकों की संख्या 9.7 फीसदी है जिनमें से 20 फीसदी ही क्वालिफाइड हैं।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली यूनिवर्सिटि के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर अनीता रामपाल के अनुसार इसका एक कारण टीचर ट्रेनिंग कॉलेजों का अभाव है।

हालात ये हैं कि वर्तमान में, उत्तर पूर्व में शिक्षा प्रणाली संतोषप्रद नहीं है। आसाम में, ट्रेंड शिक्षकों की संख्या 2014 में 39 फीसदी पाई गई जबकि करीब 7 साल पहले यह संख्या 39.8 फीसदी थी। अरुणाचल में, 2007 में 35 फीसदी ट्रेंड शिक्षक थे जबकि 2014 में सिर्फ 29 फीसदी ही हैं। मिज़ोरम में, अजीब स्थिति है क्योंकि 2007 में यह आंकड़ा 60.5 फीसदी था जो 2010 में 70.2 फीसदी हुआ लेकिन फिर 2014 में 43.8 फीसदी ही रह गया। त्रिपुरा और सिक्किम में मामूली सुधार दिखा है।

कुछ राज्यों में क्वालिफाइड शिक्षकों के अनुपात में गिरावट देखी गई है। बिहार में, क्वालिफाइड शिक्षकों की संख्या 62 से 43 फीसदी रह गई है और पश्चिम बंगाल में, यह आंकड़ा 2006-07 में 75 फीसदी था जो 2013-14 में 49 फीसदी पर आ गया।

लेख में रामपाल के हवाले से कहा गया है कि ‘‘एक विषय की जानकारी रखना या सिर्फ ग्रेजुएट होना ही शिक्षक के लिए काफी नहीं है। प्रांभिक शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों को बच्चों की सीखने की प्रक्रिया की समझ, उनकी विविधताओं का परिचय होना चाहिए इसलिए ज़रूरी है कि ऐसे शिक्षक सही निगरानी में अनिवार्य शैक्षणिक क्षमताओं के हिसाब से ट्रेंड किये जाएं।’’

इस डेटा से खुलासा हुआ है कि ऐसे में जब यह व्यवस्था बनाई गई है कि शिक्षकों को पर्याप्त योग्यता होने पर ही नियुक्त किया जाये, राज्य सरकारें और शैक्षणिक संस्थान इन कानूनों की अनदेखी कर रहे हैं। दूसरी बात यह है कि देश भर में टीचर ट्रेनिंग कॉलेजों का अभाव एक बड़ा कारण है कि खराब क्वालिटि का टीचिंग स्टाफ स्कूलों में नियुक्त है।

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